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भारत की पहली क्रोनिक किडनी डिजीज रजिस्ट्री कौन सा राज्य लॉन्च करेगा?

भारत की पहली क्रोनिक किडनी डिजीज रजिस्ट्री कौन सा राज्य लॉन्च करेगा?

ओडिशा भारत का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जो एक व्यापक क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) रजिस्ट्री शुरू करेगा।
राज्य सरकार ने इस पहल को 31 मार्च, 2026 तक लागू करने का लक्ष्य रखा है। इसका उद्देश्य एक ऐसा केंद्रीकृत डेटाबेस बनाना है जो बीमारी के हर चरण पर नज़र रखे, न कि केवल उन लोगों पर जो वर्तमान में डायलिसिस पर हैं।
एक खामोश संघर्ष: दो सच्चाइयों की कहानी
ओडिशा के शांत गांवों में, एक खामोश शिकारी खेतों के बीच से गुजर रहा है। सालों से, भारत में किडनी की बीमारी की कहानी किसी दुखद किताब के केवल आखिरी अध्याय को पढ़ने जैसी रही है। हमने हमेशा केवल अंत देखा: डायलिसिस केंद्रों में भीड़, प्रत्यारोपण (transplant) के लिए हताश लोग, और वे "10%"—जिनकी किडनी पहले ही काम करना बंद कर चुकी थी।
बाकी 90%, यानी बीमारी के शुरुआती चरणों वाले लोग, अदृश्य बने रहे। वे किसान थे जिन्हें थकान रहती थी, या वे बुजुर्ग थे जिन्हें शरीर में सूजन थी, लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि उनकी किडनी धीरे-धीरे हार रही है।
अज्ञात का मानचित्रण
इस CKD रजिस्ट्री की शुरुआत इस कहानी में एक बड़ा मोड़ है। अब डॉक्टर केवल "अंतिम चरण" का इंतजार नहीं करेंगे। इस नई पहल के तहत, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) से लेकर बड़े मेडिकल कॉलेजों तक एक डिजिटल जाल बुना जा रहा है। चाहे वह मधुमेह और उच्च रक्तचाप (BP) के कारण होने वाला मामला हो या रहस्यमय CKDu (अज्ञात कारणों से होने वाली किडनी की बीमारी), हर मामले को दर्ज किया जाएगा।
> यह क्यों महत्वपूर्ण है: केवल ओडिशा में, पिछले तीन वर्षों में लगभग 20,000 मामले और 4,700 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि 15 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी में इसकी वास्तविक व्यापकता लगभग 14% है।
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तकनीक का सुरक्षा चक्र
राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) वर्तमान में उस सॉफ्टवेयर को तैयार कर रहा है जो इस रजिस्ट्री की रीढ़ बनेगा। यह केवल नामों की सूची नहीं है; यह एक रणनीतिक नक्शा है। यह ट्रैक करके कि बीमारी कहाँ सबसे अधिक है—विशेष रूप से वे 40% मामले जिनके कारण अज्ञात हैं—सरकार अंततः विशिष्ट हॉटस्पॉट में पानी की गुणवत्ता या मिट्टी के संदूषण जैसे पर्यावरणीय कारकों की जांच कर सकेगी।
मुख्य सचिव के नेतृत्व में और AIIMS व ICMR के विशेषज्ञों के सहयोग से बनी एक 12-सदस्यीय टास्क फोर्स इस मिशन का संचालन कर रही है। उनका लक्ष्य सरल लेकिन गहरा है: "अदृश्य" रोगियों को तब ढूंढना जब उनका इलाज संभव हो, ताकि उनके स्वास्थ्य की कहानी का अंत समय से पहले न हो।

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